मौत माने क्या? जिसको आप मौत बोलते हो उसका यही अर्थ है कि समय न बचे? तो अभी क्या कर रहे हो? सोशल मीडिया पर 4 - 4 घंटे लगे हुए हो , ये समय नष्ट नहीं हो रहा है। और जो समय नष्ट कर रहा है उससे ज्यादा नुकसान किसी का नहीं होता। धन मिल सकता है आगे, गाड़ी मिल सकती है आगे, 50 चीजें और मिल सकती हैं आगे, किंतु ये जो समय गवाँ रहे हो ,यह समय आगे नहीं मिलेगा। हम सब प्रति पल मर ही रहे हैं, क्योंकि हम सब अपना समय किसी न किसी बेवकूफियों में नष्ट कर ही रहे हैं। भीतर एक गूँज होनी चाहिए, एक चेतना होनी चाहिए, एक होश होना चाहिए, जो हर आधे घंटे में पूछे कि पिछले आधे घंटे क्या किया?
हम मौत से नहीं डरते हैं हम जीवन बर्बाद जाने से डरते हैं, जैसे किसी परीक्षा हाल में सबसे ज्यादा चिंतित छात्र वही होगा जो परीक्षा के लिए कोई तैयारी ना करके आया हो और परीक्षा के समय उत्तर पुस्तिका में कुछ ना लिख रहा हो। साढ़े 3 घंटे का समय दिया गया था सभी छात्रों को प्रश्न पत्र को हल करने के लिए, जो छात्र प्रश्न पत्र हल करने में लगा हुआ है, उसको यह ख्याल नहीं आएगा कि साढ़े 3 घंटे का समय दिया गया है, वो तो केवल प्रश्न को हल करने में लगा हुआ है, चूँकि वो प्रश्न को हल करने में लगा है इसलिए हो सकता है कि उसके 3 घंटे में ही सारे प्रश्न हल हो जाए, उसको कोई डर नहीं रहेगा क्योंकि उसने अपने समय का सदुपयोग कर लिया है। डर तो उस छात्र को रहेगा जो तैयारी करके नहीं आया है और कुछ लिख नहीं रहा है।
आ रही है बात समझ में?
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हमें मृत्यु से डर नहीं है , हमें समय के बर्बाद जाने से डर है, जो समय का सदुपयोग कर रहा है , उसको किसी बात का डर नहीं होगा।
जवान आदमी हो भाई! पकड़ लो कोई ऊंचा लक्ष्य भगत सिंह की तरह , स्वामी विवेकानंद की तरह।
भगत सिंह को देखा है? हंसते-हंसते फाँसी पर चढ़ गये थे, ऐसे ही तुम भी अपने जीवन में कोई ऊंचा उद्देश बनाओगे, तो तुम्हें भी मौत के समय में हँसी आएगी, मौत भी तुम्हारे लिए मजाक बन जाएगा।
अधिकतर वो लोग जिनको भविष्य की चिंता रहती है , वो वही लोग होते हैं जिनका वर्तमान उखड़ा होता है। भविष्य की चिंता छोड़ो, वर्तमान को देखो, । अगर वर्तमान स्थिति को सही करोगे, तो भूत और भविष्य दोनों सही हो जाएगा।
मौत तो आनी है , कोई टाल नहीं सकता, परंतु मौत से पहले हमें जी जाना है। जितना भी जियो, पूरा जीयो , वर्षों की लंबाई मायने नहीं रखती, जीवन की सार्थकता मायने रखती है।
कबीर साहेब का एक दोहा है कि खजूर का पेड़ बड़ा तो हो गया है लेकिन ना तो पंथी को छाया देता है और फल भी बहुत दूर लगा हुआ है।
यह मत देखो कि तुम्हारे पास कितना समय है, यह देखो कि तुम अपनी समय का कितना हिस्सा ,सही कार्य में लगाते हो, ऊँचे लक्ष्य में लगाते हो।
मौत तो ठीक है लेकिन मौत का भय ठीक नहीं है। ये जो तुम्हें जवानी में शक्ति और सामर्थ्य दी जाती है वो इसीलिए दी जाती है कि तुम मौत से पहले अमृत की खोज कर लो। अमृत की खोज करने में , सत्य की खोज करने में, मुक्ति की खोज करने में, ताकत लगती है, ऊर्जा लगती है, समय लगता है। और अगर तुमने सत्य की तलाश नहीं की, मुक्ति की ओर नहीं गए, उसकी सजा ये होगी कि 80 - 90 साल जिओगे। 80 - 90 साल जीने में कितना कष्ट झेकना पड़ेगा उसका हिसाब किताब कर लेना। 80 - 90 साल कष्ट और पीड़ा झेल कर जीया भी तो मृत्यु तो आएगी, लेकिन मुक्ति नहीं आयेगी।
अगर मृत्यु का डर अभी भी नहीं मिट रहा, तो उपनिषदों की ओर आओ , वेदांत की ओर आओ।
