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𝗟𝗮𝗻𝗴𝘂𝗮𝗴𝗲

वेदांत , उपनिषद और गीता प्रचारक

उपनिषद के मूल प्रश्न

मन की बेचैनी दूर कीजिए उपनिषद पढ़िए

 उपनिषद के मुख्य प्रश्न



प्रश्न - ब्रह्म कौन है?
सर्वव्यापी, निर्गुण , निराकार, शाश्वत, सनातन, शांत, शुद्ध ,अचिंत्य, साक्षी चैतन्य ही ब्रह्म है। 
प्रश्न - ईश्वर कौन है?
जब निर्गुण निराकार ब्रह्म ही अपनी शक्ति से सृजन करता है और मन और बुद्धि और इंद्रियों को नियंत्रित करता है, और सतप्रेरणा देता है तब यही ईश्वर होता है।
प्रश्न - जीव क्या है?
जब इसी चैतन्य को अपने स्थूल शरीर का मिथ्या अभिमान हो जाता है, तब इसे ही जीव कहते हैं।
प्रश्न - जगत क्या है? संसार क्या है?
मन का प्रसार ही जगत है? मन का निरोध हो जाए तो संपूर्ण चराचर जगत ही वश में हो जाए।
प्रश्न - परमात्मा क्या है?
निर्गुण निराकार ब्रह्म ही परमात्मा है। यह समस्त विश्व उसी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं। परमात्मा के शिवाय दुनिया में कुछ है ही नहीं। परमात्मा के सिवाय जो कुछ दिखता है वह सब मिथ्या है, भ्रम है।
प्रश्न - कर्म क्या है ? अकर्म क्या है ?
कर्म कोई ऐसी क्रिया है, जिससे शरीर यात्रा सिद्ध होती है। कर्म वही है जो जन्म मरण के बंधन से मुक्ति दिलाने वाला है। और जो क्रिया मुक्ति की राह में बाधक हैं, वही अकर्म है। दुनिया में लोग कुछ न कुछ करते हैं और वो देहाभिमान के कारण इसी को कर्म मानते हैं? जबकि यह कर्म नहीं हैं। शुद्ध कर्म तो मोक्ष दिलाने वाला है।
प्रश्न - आध्यात्म क्या है?
आत्मा का आधिपत्य ही आध्यात्म है। जब आत्मा आधिपत्य नहीं रहता तब लोग माया के आधिपत्य रहते हैं। इस माया को पार पाना और आत्मा में स्थित होना ही आध्यात्म है। 
प्रश्न - शुभ क्या है? अशुभ क्या है?
जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में वास करना शुभ है। प्रकृति में खो जाना ही अशुभ है। प्रकृति में खो जाना ही वर्णसंकरता है।
प्रश्न - वासुदेव कौन है?
परमात्मा में वास दिलाने वाले ही वासुदेव हैं।
प्रश्न - मन को वश में कैसे करें? 
इंद्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है , और बुद्धि से भी परे तुम्हारा साक्षी चैतन्य स्वरुप है। अपने स्वरुप से प्रेरित होकर मन को वश में किया जा सकता है।
प्रश्न - क्या आप शरीर हैं? 
ये पुरुष जन्म- जन्मांतर से शरीर की ही यात्रा कर रहा था, आप शरीर नहीं हैं । शरीर तो आवरण है, रहने का मकान है, इसमें रहने वाला अनुराग पूरित चेतना है। अपने आप को शरीर मानना मूढ़ता है। 
अज्ञानी पुरुष अपने आप को शरीर मानते हैं और केवल शरीर की लिए ही पचते हैं। ऐसे अज्ञानी इसी चिंता में अपना जीवन बिता देते हैं कि उनक पास कितना है और कितने का अभाव है? जबकि ज्ञानी पुरुष की पास जो कुछ उपलब्ध है उसी को ईश्वर का वरदान समझकर सुखपूर्वक भोगते हैं।

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